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Friday, 12 August 2011

भारतीयों, राष्ट्रध्वजके प्रति अपनापन एवं सम्मान वृद्धिंगत कीजिए !

१५ अगस्त ! भारतका सार्वभौम गणतंत्र दृढ करनेकी प्रेरणा जगानेवाला राष्ट्रीय त्यौहार ! क्रांतिकारियोंने जिसके लिए प्राण अर्पित किए उस राष्ट्रध्वजको वंदना, क्रांतिकारियोंका स्मरण एवं राष्ट्रगीत-गायनद्वारा राष्ट्रीय अस्मिता जागृत करनेका यह दिन ! ६४ वर्षोंकी स्वतंत्रताके उपरांत आज भी यह दिन मनाते समय हमें क्या देखनेको मिलता है ? राष्ट्रध्वजका अनादर, राष्ट्रगीतकी अवमानना एवं क्रांतिकारियोंका अनादर, यही ना ! भारतीयों उठो ! राष्ट्रीय प्रतीकोंका अध:पतन रोकनेका राष्ट्रीय कर्तव्य निभाएं !





राष्ट्रध्वजका अनादर रोको


भारतीयों, राष्ट्रध्वजके प्रति अपनापन एवं सम्मान वृद्धिंगत कीजिए !

भारतीयों, राष्ट्रध्वज एवं राष्ट्रके अन्य प्रतीक इनकी ओर संकुचित वृत्तिसे न देखकर उसके संदर्भमें जागरूकता बढाइए । राष्ट्रध्वज राष्ट्रीय अस्मिताका प्रतीक है । उसका योग्य मान रखना, यह राष्ट्राभिमानका लक्षण है । राष्ट्रध्वज हमें त्याग, क्रांति, शांति एवं समृद्धि जैसे मूल्योंकी शिक्षा देता है । उत्साहके आवेशमें राष्ट्रध्वजका अनावश्यक एवं अनुचित उपयोग करते समय हम इन मूल्योंको ही अपने पैरोंतले रौंद रहे हैं, यह सदैव स्मरण रखिए । राष्ट्रध्वजका होनेवाला अपमान रोकना, यह प्रत्येक नागरिकका कर्तव्य है । स्वातंत्रता प्राप्तिके लिए लडनेवाले स्वातंत्र्यवीरोंकी एवं क्रांतिकारियोंका स्मरणकर उनके जिन गुणोंके कारण उन्होंने स्वतंत्रता-संग्राम किया, उन गुणोंको आत्मसात कर,  उसीनुसार आचरण करनेका प्रयत्न करेंगे ।

राष्ट्रध्वजको अपमानित न होने दें !

  • ध्वजसंहितामें बताए अनुसार एवं ऊंचे स्थानपर राष्ट्रध्वज फहराएं ।

  • छोटे बच्चोंको राष्ट्रध्वजका उपयोग खिलौनेसमान न करने दें ।

  • मुख तथा कपडे राष्ट्र्रध्वजसमान न रंगवाएं !

  • प्लास्टिकके राष्ट्रध्वजका उपयोग पताकाके रूपमें न करें ।

  • राष्ट्रध्वज पैरोंतले रौंदा न जाए तथा फटे नहीं, इसपर ध्यान दें ।

  • राष्ट्रगीत-गायन अनुचित स्थान एवं अनुचित समयपर न हो, इसपर ध्यान दें!

  • राष्ट्रगीतके अंततक ‘सावधान’ स्थितिमें खडे रहें तथा उस समय आपसमें बात न करें !


 

क्रांतिकारियोंने इतिहास रचा; क्या हमारे लिए संभव नहीं ?

इतिहासका निर्माण होता है पसीने और रक्तकी बूंदोंसे; गुलाबजल और इत्र (इतर)की बूंदोंसे नहीं ! राष्ट्र और धर्मके लिए जूझनेवाले नरवीर ही इतिहास रचते हैं, जिससे प्रेरणा लेकर नया इतिहास बनाना पडता है । इसके लिए आवश्यक होता है दृढ मन, आत्मसमर्पित बुद्धि तथा धमनियोंमें वेगसे बहता राष्ट्राभिमान एवं धर्माभिमान ! राष्ट्रकार्यको धर्मकी जोड देनेवाले स्वामी विवेकानंद एवं लोकमान्य तिलक समान राष्ट्रपुरुष एवं राष्ट्रभक्तिको ही भगवद्भक्ति माननेवाले स्वा. सावरकर, सरदार भगतसिंह समान क्रांतिकारियों जैसे महान पूर्वजोंका रक्त हमारी धमनियोंमें बह रहा हो, तो क्या हम इतिहासका नवनिर्माण नहीं कर सकते ?

दृष्टि होते हुए भी हम अंधे ही बने रहे

क्रांतिवीरोंने स्वतंत्रता संग्राम इसलिए किया कि उन्हें ब्रिटिश सरकारद्वारा किए जा रहे अन्याय एवं दमनसे घृणा थी । आज स्वतंत्र भारतमें अन्याय एवं दमन नहीं हो रहा है क्या ?
१. भारतीयोंके पसीनेकी कमाईके ४०० लाख करोड रुपए, भ्रष्टाचारके काले धनके रूपमें स्विस बैंकमें पडे हैं । क्या यह भारतीयोंपर अन्याय नहीं है ? क्या इसके फलस्वरूप दरिद्रता, महंगाई और भूखमरी बढ नहीं रही है ?
२. पैसोंसे क्रय किए (खरीदे) जा चुके प्रसारमाध्यम हिंदु संतोंकी जानबूझकर अपकीर्ति करते हैं । क्या यह उन संतोंपर अन्याय नहीं है ? क्या इससे देशकी युवा पीढी धर्मसे दूर नहीं होती जा रही ?
३. देशमें ही राष्ट्रद्रोही एवं धर्मांध लोग आतंकवादियों और नक्सलवादियोंकी पूरी सहायता करते हैं और उनके कुकर्मोंपर परदा डालते हैं, जहां-तहां उपद्रव भडकाते हैं । ऐसोंके विरुद्ध थानेमें परिवाद प्रविष्ट करवाने गए राष्ट्राभिमानी नागरिकोंपर ही उपद्रव भडकानेका आरोप लगाया जाता है । यह उस राष्ट्राभिमानीका दमन नहीं तो और क्या है ? यदि इसी प्रकार चलता रहा, तो देशमें होनेवाले बमविस्फोट, उपद्रव आदि कब रुकेंगे ?
इस  प्रकार कितनी ही अनुचित बातें आंखोंके सामने होते हुए देखकर भी हम उस विषयमें जागरूक नहीं हुए; तो हम अंधे ही हुए ! यदि हम इतने संवेदनहीन हो गए हैं, तो हम जीवित होकर भी मृतवत् हैं !

आज नहीं जागे, तो कल मृत्यु निश्चित समझिए !

सुखी-संपन्न परिवारमें रहनेवाले कभी अन्यायके विरुद्ध जाग्रत नहीं होते; क्योंकि वे जीवनभर सुखमय जीवनयापन करना चाहते हैं । परंतु थोडा विचार कीजिए, यह सुखमय जीवन हम कबतक जी सकते हैं ?
भारतमें १४,००० सशस्त्र आतंकवादी घुसानेकी सिद्धता पाकने की है, उसी प्रकार पिछले कुछ वर्षोंमें पाकने अपनी युद्धसज्जताको अनेक गुना बढाया है । चीनने तो भारतको निगलनेके लिए सीमावर्ती भागोंमें मार्गोंका जाल बिछा दिया है । सामने इतना प्रबल शत्रु होते हुए भी भारतने इस शत्रु राष्ट्रके विरुद्ध अबतक कोई  ठोस नीति नहीं अपनाई है और ऐसा करनेकी संभावना भी अल्प है । संक्षेपमें, युद्ध अटल है । यह युद्ध क्या केवल दो राष्ट्रोंके साथ होगा ? आज संसार इतना छोटा हो गया है कि यदि पाकिस्तान भारतसे युद्ध आरंभ करता है, तो संसारके सभी मुसलमान राष्ट्र पाकके साथ कंधेसे कंधा मिलाकर खडे हो जाएंगे । संक्षेपमें, हम आज तीसरे महायुद्धकी कगारपर खडे हैं ।

जाग्रत होनेके लिए हम क्या कर सकते हैं ?

पहला चरण - स्वयंपर राष्ट्रभक्तिका संस्कार करना : कोई भी बात हमसे प्रयत्नपूर्वक होनेके लिए सर्वप्रथम उसका महत्त्व मनपर बारंबार अंकित करना आवश्यक होता है । स्वा. सावरकर समान राष्ट्रभक्तोंद्वारा लिखे गए क्रांतिविषयक ग्रंथ पढना, देशभक्तिपर आधारित चलचित्र देखना, राष्ट्रजागरण करनेवाले भक्तोंके प्रवचन सुनना, राष्ट्रीय कीर्तनकारोंके कीर्तनोंका श्रवण और अभ्यास करना, ऐसे प्रयत्न निरंतर करते रहनेसे हमपर राष्ट्रभक्तिका संस्कार होगा ।
दूसरा चरण - अपनेमें राष्ट्रके प्रति संवेदनशीलता बढाना : किसी विषयका महत्त्व भली-भांति समझ लेनेपर भी जबतक उसका उचित आचरण करना नहीं आता, तबतक मनकी सिद्धता (तैयारी) स्पष्ट नहीं होती । हम अपने मनको समर्थ बना सकते हैं । उदा. कभी शरीरके किसी भागमें वेदना हो रही हो, तो उस समय स्मरण करना कि, ‘स्वा. सावरकर समान देशभक्त अंदमानमें घंटों कोल्हू चलाते थे तथा नारियलकी जटाओंसे रस्सियां बनाने जैसे मरण-यातना समान दंड उन्होंने राष्ट्रके लिए सहे थे । उन वीरोंकी तुलनामें हमारा कष्ट तो कुछ भी नहीं है ! हमें अपनी दुःख सहनेकी क्षमता बढानी चाहिए !’



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